भारतीय समयानुसार रात के साढ़े बारह बज रहे होंगे और फ़्रैंकफ़र्ट के साढ़े आठ , अभी हल्की गुनगुनी सी धूप चारों तरफ़ फैली थी ।रात शुरू हो चुकी थी मगर गर्मियों में अँधेरा यहाँ दस बजे शुरू होता है ।एयरपोर्ट से बाहर आ कर कैब में बैठते ही चारों तरफ़ नजर डाली ;ऐसा महसूस हुआ कि सारा शहर चुप्पी ओढ़ कर सो रहा है । इक्का-दुक्का गाड़ियाँ जब हवा को चीरतीं हुईं चलतीं तो बस वही आवाज शान्ति भंग करती ,बाक़ी कोई हलचल नहीं ,हॉर्न भी नहीं ।सड़क के दोनों ओर सब कुछ जैसे जड़ सा खड़ा है।गाड़ियाँ अपनी-अपनी मार्क्ड पार्किंग में खड़ीं हैं ।इनके दिन-रात तो घड़ी की सुइयों के अनुसार शुरू होते हैं , इतने व्यवस्थित और अनुशासित होते है ये लोग ।छह से आठ डिनर और नौ से दस बजे सोने का वक़्त।दस तक तो रेस्टोरेंटस तक सब बंद ।
बच्चों के पास इस देश में कई बार आये मगर इस बार आए तो इमिग्रेशन काउंटर पर अटक गए।वीजा लम्बा था और हम इत्मीनान में थे।पिछले दिन ही छोटी बेटी ने टेक्स्ट किया कि पुराना इन्वाइट लेटर जरूर रख लेना।फिर चलने से पहले लिखा कि आपका इमिग्रेशन ठीक से हो जाए , सपने में मुझे लगा कि कुछ ठीक नहीं हुआ।
जिस देश में परिन्दा भी उनकी मर्जी के बिना पर नहीं मार सकता , वहाँ उनकी पूरी तसल्ली के बिना प्रवेश नहीं किया जा सकता। वो मय सामान के बैरंग आपको वापिस लौटा देंगे उस पैसे के साथ जो इंश्योरेंस के रूप में टिकट के साथ उन्होंने पहले ही आपसे वसूल रखा है , या फिर पुलिस के पास पहुँचा देंगे , आगे उनके नियम।
अब हुआ यूँ कि इन्वाइट लेटर हैंड बैग में नीचे होता गया , ऊपर कुछ और समान रखा गया । टिकट , इंश्योरेंस सब फ़ोन पर ही थे , पासपोर्टस हाथों में । काउंटर ऑफिसर सख़्त लहजे में बोला कि यहाँ रहने के सारे डॉक्यूमेंट्स , रिटर्न टिकट का डेट और उस अवधि के लिए प्रयाप्त करेंसी सब एक साथ दिखाओ । अब मैं उसे कैसे समझाती कि बाहर तो मेरे दो दो बैंक मुझे लेने आ रहे हैं तो मैं तुम्हें करेंसी क्यों दिखाऊँ।उसने तो हमें साइड में करा दिया ।
एयरपोर्ट के वाई-फाई से मैं फ़ोन कनेक्ट कर ही चुकी थी तो बेटी को मेसेज किया , उन्होंने एक बार फिर से इंश्योरेंस , वापिसी टिकटस के ऑनलाइन डॉक्युमेंट्स भेजे । ख़ुद एयरपोर्ट पुलिस के पास पहुँचीं कि अगर प्रॉब्लम हल नहीं होती तो अगला कदम क्या कर सकते हैं।
कहते हैं जब हमने कुछ ग़लत न किया हो तो घबराना नहीं चाहिए।हर कोई अपना काम कर रहा है , उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतनी ही होती है । खैर अगले दो-पाँच मिनट में ही हमें अपना इन्वाइट लेटर भी मिल गया , ऊपर कुछ सामान रखा गया था ।अब सब एक साथ दिखाने के बाद उसने कैमरे से फेस रेकग्निशन भी एश्योर कर लिया और हमें प्रवेश दे दिया । हमने उसे हमारी वजह से हुई असुविधा के लिए सॉरी और डाँके-शोन ( जर्मन में धन्यवाद )कहा। ग़ल्ती तो की थी फिर बेटी के सपने को भी तो सच होना था ।😄बेटियों को मेसेज किया कि सब ठीक हो गया , अंत भले का भला । All is well that ends well .
एक माँ तो टिकट बुक होने के साथ ही तैयारी में लग जाती है कि बेटियों से मिलेंगे तो ये , मिलेंगे तो वो ।खैर एयरपोर्ट से बाहर आए कैब में बैठ कर शहर को एक बार फिर से महसूस किया।आप यूरोप आए बिना यहाँ को फील नहीं कर सकते ।एक अजब सी खामोशी ,शांति , समृद्धि,नफ़ासत ,अनुशासन , शुचिता और उजलापन है यहाँ की फ़िज़ाओं में। कम जनसंख्या होने की वजह से कहीं कोई मारा-मारी नही ,मौसम और स्थान का अपना सौंदर्य तो यहाँ का आकर्षण है ही।सब से बढ़ कर बच्चों के घर हैं , बच्चों का जीवन बँधा है यहाँ के कार्य-कलापों से । बेटी ने कहा कि गाड़ी चलाना सीख रही हूँ , क्लासेज ले रही हूँ ।अगली बार आओगे तो ख़ुद ड्राइव कर के ले जाऊँगी ।हमने ईश्वर का धन्यवाद किया कि हम सामान सहित भले-चंगे अपने बच्चों के पास पहुँच गए हैं ।
और फिर एक दिन हम पहुंचे सवा घंटा दूर कोलोन शहर में यहाँ के प्रसिद्ध तीसरे सब से बड़े प्राचीन गॉथिक शैली में निर्मित कैथेड्रल को देखने जो १२४८ में बना और ६०० साल में यानि १८८० में पूरा हुआ।
