जिन्दगी के रंग दोस्तों के संग
मंगलवार, 30 जून 2015
एक थी भिरावाँ
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सोलह साल की छरहरी सी किशोरी , हाथ भर घूँघट काढ़े , लाज-शर्म से दोहरी होती जब डोली में बैठी ; तब यही सोच रही थी कि उसका नौशा तो बीस-बाइस साल...
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मंगलवार, 7 अप्रैल 2015
समय के साथ बहना
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सुकान्त को जैसे ही पता चला कि मुझे साउथ इण्डियन डिशेज इडली डोसा वगैरह पसन्द हैं , उसने कहा " तो ठीक है दीदी , आज आपको रेलवे स्टेशन छोड़...
शुक्रवार, 18 जनवरी 2013
पाकड़ की जुबानी
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मुझे दयानन्द सागर के बेटे ने बाहर के अहाते में रोपा था। जब मैं तीन-चार साल का हुआ , यानि जब बाहरी दीवार का कद मैंने लाँघ लिया ,मुझे घर के अ...
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रविवार, 26 जुलाई 2009
ज़िन्दगी के रँग दोस्तों के सँग
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ज़िन्दगी के रँग दोस्तों के सँग बहुत चमकीले हो उठते हैं , अगर ऐसा न होता तो मेरे स्मृति-पटल पर ज़िन्दगी की पहली याद उसकी न होती ..... कस्बे से...
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