जिन्दगी के रंग दोस्तों के संग
शुक्रवार, 18 जनवरी 2013
पाकड़ की जुबानी
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मुझे दयानन्द सागर के बेटे ने बाहर के अहाते में रोपा था। जब मैं तीन-चार साल का हुआ , यानि जब बाहरी दीवार का कद मैंने लाँघ लिया ,मुझे घर के अ...
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रविवार, 26 जुलाई 2009
ज़िन्दगी के रँग दोस्तों के सँग
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ज़िन्दगी के रँग दोस्तों के सँग बहुत चमकीले हो उठते हैं , अगर ऐसा न होता तो मेरे स्मृति-पटल पर ज़िन्दगी की पहली याद उसकी न होती ..... कस्बे से...
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