मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

समय के साथ बहना

सुकान्त को जैसे ही पता चला कि मुझे साउथ इण्डियन डिशेज इडली डोसा वगैरह पसन्द हैं , उसने कहा " तो ठीक है दीदी , आज आपको रेलवे स्टेशन छोड़ने जाने से पहले 'दासा प्रकाशा ' पर डिनर करेंगे।" सुकान्त मुझसे तकरीबन पन्द्रह साल छोटा है , मुझे मौसी की जगह दीदी ही कहता है।

रास्ते में रुक कर डोसा , केसरी हलवा और कॉफी पी कर हम स्टेशन पहुँचे। ट्रेन आने में अभी वक्त था। मैं मुश्किल दौर से गुजर रही थी।  बातें करते हुए सुकान्त ने कहा " दीदी , मैं ऐसा सोचता हूँ कि जब वक्त खराब हो तो नया कुछ भी नहीं करना चाहिये। बस वक्त गुजरने देना चाहिये। " सुनने में तो बात बड़ी मामूली सी है मगर ज़िन्दगी का बड़ा फलसफा समेटे हुए है।

सुकान्त ने आठ साल चेन्नई के स्कूल से पढ़ कर दिल्ली के श्री राम कॉलेज से बी. कॉम. किया। ऑल इंडिया लेवल पर मैथेमेटिक्स की कम्पटीशन जीती। इसी बीच मम्मी को एक एक्सीडेंट में खो बैठा। बड़े जोर-शोर से अपना व्यवसाय शुरू किया। अर्श पर पहुँचने के बाद अचानक एक झटके में शेयर बाजार औंधे मुँह गिरा।  इसके साथ ही सारे क्लाइन्टस ने पैसा वापिस माँगना शुरू कर दिया।  अपनी और डैडी की सारी जमा पूँजी से भी भरपाई  का कुछ अँश ही चुका पाये। लेनदारों के तकाजे और अपनों का पराया व्यवहार काफी जलील कर गया।  अब अचल सम्पत्ति का बिकना शुरू हुआ।  आखिर में जिस घर में रहते थे उसे बेच कर दो बेड-रूम वाला फ़्लैट खरीदने का फैसला लिया गया ,और शेष पैसे से क्लाइन्टस का बकाया भरना तय किया गया। इस बीच सुकान्त व सुकान्त की बहन की शादी तय थी। सारी तैय्यारी के बावजूद , इस सारे काण्ड के बाद सुगन्धा की नानी आईं और शादी तोड़ कर चलीं गईं।

इतना सब कुछ हो गया था , मगर सुकान्त के चेहरे से कोई ये अन्दाज़ नहीं लगा सकता था कि उस पर क्या-क्या गुजर चुका था। उसने अपने तनाव की शिकनें अभिव्यक्त नहीं कीं। बहन की शादी में अनहोनी की आशंका से सबके दिल धड़क रहे थे।  खैर बहन की शादी ठीक से हो गई। इतना शुक्र था कि उसके पापा के रिटायरमेंट को अभी कुछ साल बचे थे। वे इस उम्र में बेटे की इतनी बड़ी आर्थिक हानि को पचा नहीं पा रहे थे। इतना कुछ खो कर भी जो उन्होंने नहीं खोया था वो था बाप बेटे का रिश्ता। वो उसके लिये जो भी सम्भव हो सकता था करने के लिये तैय्यार थे। मगर जब घर बदलने का वक्त आया तो उस घर से जिसे चेन्नई से आने के बाद तीन साल पहले ही उन्होंने बड़े चाव से सजाया था , जिसमें आने के साल-डेढ़ के अन्दर ही वो अपनी पत्नी को खो बैठे थे ,सामान उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। उन्होंने फैसला किया कि एल. आई. सी. से जो ईनाम के तौर पर इन्टर-नेशनल टूर की टिकट्स उन्हें मिली हैं , उसे वो अभी अवेल कर लेंगे और अमेरिका में डेढ़ महीना अपनी बेटियों के पास बितायेंगे। इस बीच बेटा और उसकी वही मँगेतर जिससे शादी टूट गई थी , घर शिफ्ट कर लेंगे। वो लगातार सुकान्त के सम्पर्क में थी , घर वालों के सगाई तोड़ने के बावजूद उसने सुकान्त से मिलना छोड़ा नहीं था , घर ढूँढने में सुकान्त की भरसक मदद की थी।

खैर घर बदल लिया गया , लेनदारों की तरफ से राहत हुई।  सुकान्त ने इस बीच रेडीमेड गारमेंट्स के डिस्ट्रिब्यूशन का काम शुरू किया। काम मन का नहीं था। इसी बीच कोलकाता एक्सचेंज के एडवाइजर की पोस्ट का ऑफर सुकान्त को मिला। ये नौकरी स्थायित्व लिये थी। यहाँ से दिन बदलने शुरू हो गये। सुगन्धा के घर वाले शादी के लिये हाँ कर गये , और फिर अच्छे से शादी हो गई। सुकान्त के डैडी का रिटायरमेंट पास था , दोनों ने योजना बनाई कि एक अच्छा ऑफिस बना कर काम दिल्ली में शुरू किया जाये , और अब रिस्क बिल्कुल न उठाया जाये। पापा को एल.आई.सी. का अच्छा अनुभव था , बेटे को अपने काम का अनुभव था।  काम बेतहाशा चल निकला। आज सुकान्त  सिँगापुर एक्सचेंज का एडवाइजर भी है। टी. वी. पर अक्सर इन्टरवियुज आने लगे। आज विदेशों में भी अपना काम फैलाने पर काम चल रहा है। अर्श से फर्श पर आना और फिर से अर्श तक पहुँचना , सुकान्त को छोटी उम्र में ही बहुत कुछ सिखा गया था।


उसके चेहरे पर वही अल्हड़ और निश्छल सी मुस्कान सदा सजी रहती है।  समन्दर में निश्चेष्ठ हो कर बहने की कला बिरले ही जानते हैं।  जब वक्त बुरा हो , लहरों के बवण्डर में अपना बल लगा कर भी डूबने का खतरा बना रहता है।  आज उसका ये कहना कि बुरे वक्त में आदमी को नया कुछ भी नहीं करना चाहिये , मुझे ऐसा लगा कि ये तो मुर्दा होने की कला है। भार हीन हो कर बहाव में बहने से नुक्सान का डर कम से कम होता है। जब वक्त अच्छा हो तो आदमी मिट्टी को भी हाथ लगाता है तो वो सोना बन जाती है।  कुछ खेल किस्मत का होता है , कुछ खेल धैर्य और समझदारी के साथ वक्त के साथ-साथ बहने का होता है। सफल वही होते हैं जो मुसीबतों से घबराते नहीं।

पत्थर से झरना फूटेगा ,तकदीर है तेरे हाथों में        
आगे बढ़ते रहना है ,ये बात सदा तुम याद रखो 
भावों की सरिता बहती है , कल-कल इसको तुम शाद रखो 
मोती हैं सिन्धु के सीने में , हलचल को भी आबाद रखो 
मुमकिन है हवाएँ फुसला लें , हिम्मत अपनी को याद रखो 
झिलमिल तारों की दुनिया में , चन्दा को अपने बाद रखो 
तिनका भी सहारा बन जाता , उम्मीद का सूरज का साथ रखो 

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एक रिटायर्ड चार्टर्ड एकाउंटेंट बैंक एक्जीक्यूटिव अब प्रैक्टिस में ,की पत्नी , इंजिनियर बेटी, इकोनौमिस्ट बेटी व चार्टेड एकाउंटेंट बेटे की माँ , एक होम मेकर हूँ | कॉलेज की पढ़ाई के लिए बच्चों के घर छोड़ते ही , एकाकी होते हुए मन ने कलम उठा ली | उद्देश्य सामने रख कर जीना आसान हो जाता है | इश्क के बिना शायद एक कदम भी नहीं चला जा सकता ; इश्क वस्तु , स्थान , भाव, मनुष्य, मनुष्यता और रब से हो सकता है और अगर हम कर्म से इश्क कर लें ?मानवीय मूल्यों की रक्षा ,मानसिक अवसाद से बचाव व उग्रवादी ताकतों का हृदय परिवर्तन यही मेरी कलम का लक्ष्य है ,जीवन के सफर का सजदा है|